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मंगलवार, 10 अप्रैल 2012

स्वयं की शक्ति और अनजान भय से मुक्त्ति Power of Meditation

इस पोस्ट को पढ़ने से पहले शांत होकर ये मनन करें कि आज तक आपने कितना धन कमाया और कितना बचाया क्यों हम धन के स्थायी साधन की खोज में लगातार असफल हो रहे हैं, और जो साधन या नौकरी है उसमें हमें घुटन क्यों होती है क्यों हम स्वयं को दीन-हीन और लाचार पाते हैं जबकि जीवन जीने के लिये धन तो कमाना जरूरी है और फिर क्यों हम कुछ और कागज के टुकड़ो के लिये अपना जीवन नर्क बना रहें हैं क्या हम जीवन और अधिक धन कमाने के लिये ही जी रहें हैं या आधे-आधे करोड़ रूपये के मकान को खरीदना है और उनकी किश्तो को चुकाने को लक्ष्य बना कर ही अपना जीवन जी रहें हैं। कुछ है जिसे हम अपनी जवानी और बुढ़ापे में मिस कर रहें हैं कुछ है जिसके बिना हम अपने जीवन में शांति के लिये लगातार तनाव, क्रोध, परनिंदा, चिंता से पीछा छुड़ानें में लगे हुये हंै।

शुरूआत करते हैं एक कहानी से - एक गांव में एक तपस्वी महात्मा परमात्मा की भक्ति में लीन रहते थे पूरे गांव के लोग उनकी सेवा में लगे रहते थे। एक बार रात के समय महात्मा ने काल को गांव की ओर आते देखा और उसको सावधान किया तब यमराज ने बताया की विधि के विधानानुसार इस गांव से मुझे एक विशेष बीमारी के माध्यम से 500 लोगों को काल के गाल में समाना है तब उन महात्मा ने यमराज को सावधान किया कि ध्यान रहे केवल 500 लोगों के ही प्राण आप इस बीमारी से लेंगे। यमराज से उन्हें भरोसा दिलाया। महात्मा लोगों की सहायता करने में असमर्थ थे इसलिये वे कुछ महिनो के लिये यात्रा पर निकल गये। वापस लौटने पर गांव वालों ने उन्हें अपना दुख सुनाया और बताया कि गांव में पूरे 1500 लोग मारे गये। तब उन महात्मा ने यमराज को ललकारा तब यमराज ने बताया कि मैने पूरी ईमादारी से इस बीमारी से केवल 500 ही जानें ली हैं तब महात्मा ने पूछा कि यहाँ तो पूरे 1500 लोग अपनी जान गवां बैठें हैं तब यमराज ने बताया कि बाकी 1000 लोग तो इस बीमारी के भय से ही अपने प्राण गवां बैठे और अकाल मृत्यु को प्राप्त हुये। इसमे मेरा कोई दोष नही।
इस कहानी का सार तो हम समझ ही चुके है अब आप अपने घर के बगीचे या गमले में जो आपने अपने मनपसंद का पौधा लगाया है उसके आस पास नजर डालें। आपको उसके आस-पास बहुत से खरपतवार या स्वयं ही उग आये पौधे और घास दिखाई देगी। अब आप एक एक कागज की पर्चियाँ बनायें एक पर्ची पर लिखे तनाव, दूसरे पर लिखे अनजाना भय, तीसरे पर लिखे चिंता और चौथे पर लिखे क्रोध। अब इन पर्चियों को इन खरपतवार वाले पौधों पर लगा दीजिये। जो पौधा आपने उगाया है उसकी जड़ों में खाद डालें। कुछ दिनों बाद आप पायेंगे कि उस खाद का उपयोग आपके पौधे ने तो बहुत ही कम किया लेकिन उन खरपतवार वाले पौधे उस खाद को पाकर और हरे भरे और बढ़ गये। हमारे जीवन में भी यही हो रहा है हमारी विचार शक्ति इन तनाव, चिंता, क्रोध और अनजान भय के कारण अपना हृास कर रही है हम स्वयं को इन चारों विकारों से बनी चार दीवारी में स्वयं को कैद किये बैठे हैं जिससे हमे बाहर निकलने का मार्ग नही सूझता। घर की चिंतायें, कार्यस्थल या व्यवसाय का तनाव, बात बात में क्रोध और हम समय एक अनजाना भय बना रहता है। आप सभी डिस्कवरी चैनल तो देखते ही होंगे जिसमें दिखाया जाता है कि कैसे 10-15 शेरनियाँ एक हाथी को लगातार अपने दांतों से नोंच नोंच आक्रमण कर धराशयी कर देती हैं, हाथी बलशाली होते हुये भी स्वयं की रक्षा नही कर पाता। और आपने ये भी देखा होगा कि कभी कभी एक अकेला सैनिक ही पूरी एक टुकड़ी को परास्त कर देता है। ये दोनों घटनाये मनोबल की शक्ति का परिणाम हैं, तो हमें एक बात याद रखनी है कि हमें अपने मनोबल को किसी भी परिस्थिति में कम नही होने देना है और लगातार मनोबल की शक्ति को बढ़ाने की ओर अग्रसर होना है। ऐसे आध्यात्मिक और प्रेरणास्पद ज्ञान को लगातार प्राप्त करते रहना है जिससे हमारा मनोबल बना रहे। जैसे किसी पानी की बंूद को भी यदि तेज बहाव में डाल दिया जाये तो वह भी अपनी शक्ति बढ़ा लेती है और उस तेज बहाव का हिस्सा होती है। और यही तेज बहाव अपने साथ -साथ बड़े-बड़े लकड़ी के गठ्ठरों को भी बहा ले जाता है। हमे अपनी वर्तमान संगति पर विचार कर यह तय करना होगा कि कही ये संगति हमारे मनोबल को तोड़ तो नही रही या हमें हीनभावना से ग्रस्त तो नही कर रही। हमारे मित्रों या प्रतिदिन साथ रहने वालें में कुछ लोग ऐसे होतें हैं जो अपनी बातों से ही हमारे अंदर एक अनजाना भय पैदा करते हैं जैसे फलां अधिकारी या कर्मचारी तुम्हारी बुराई कर रहा था या बॉस आज तुम्हारे बारे में पूछ रहे थे या कम्पनी घाटे में चल रही है आदि इन सब बातों को सुनकर आपके मन में अपनी नौकरी के जाने का अनजाना भय पैदा होता है तब आप एक तनाव और नई नौकरी की चिंता से अपनी विचार शक्ति को बर्बाद करते रहते हैं आपका मन किसी कार्य में पूर्णता नही दिखाता हमेशा नकारात्मक सोच लिये प्रवृत्त रहता है। हमें मौन रहकर कोई भी रियेक्शन या केवल बनावटी रियेक्शन देकर ऐसे दृष्ट लोगों की बातों को केवल सुनना है यदि हम अपनी संगति बदल नही सकते तो हमें सत्संग की प्रवृत्त होकर अपने अंदर एक समझ पैदा करना है ऐसे लोगों की पहचान करने के   लिये। घर पर भी हमारे माता पिता, पत्नी या बच्चे लगातार नये-नये लोगों के विषय में बताते रहते हैं जो हमसे ज्यादा कमा रहे हैं जैसे कभी कभी पत्नी कहती है कि देखों फलां के पति को कितना ज्यादा कमाते हैं घर में किसी चीज की कमी नही है तुम भी कोशिश क्यों नहीं करते और बच्चे कहते हैं पापा हमें रिमोट वाला खिलोैना चाहिये, बड़ी वाली चाकलेट चाहिये आदि। ये सब बाते हमें और अधिक धन कमाने के आइडिये सोचने और खोजने के लिये मजबूर करती हैं और हम इस ओर प्रवृत्त भी होते चले जाते हंै लेकिन न हमें संतृष्टि होती है न हमारे परिवार की आवश्यकता कम होने का नाम लेती है नतीजा होता है मन लगातार अशांत बना रहता है। फिर एक क्रोध रूपी ज्चालामुखी प्रतिदिन फूटता है जो वह नियमित हो जाता है। हम अपना परिवार माता पिता होते हुये भी स्वयं को इस दुनिया में अकेला महसूस करने लगते हैं जिसका नतीजा होता है हम लोगों से और अपने परिवार से कटने लगते हैं। इस स्थिति में हम किसी देवीय चमत्कार की आस में मंदिरों में जाना नियमित करते हैं खूब घंटे और घडियाल बजाते हैं ज्योतिषियों से अपना भविष्य पता करते हैं और हम भ्रम पाल लेते हैं कि कोई ऐसा ग्रह है जो हमारी कुंडली में महादशा और न जाने क्या क्या कर रहा है आदि । अकेले में हम भगवान को कोसते हैं कि कैसी लाईफ दे दी। कभी तो हम देवी देवाताओं को भी ट्राई करते हैं भले ही हमारे शहर में हनुमान जी का मंदिर हो लेकिन हम भागते हैं किसी विशेष हनुमान जी के मंदिर की ओर कि शायद वो वाले हनुमान जी जल्दी मनोकामना पूरी करते हैं या किसी मनोकामना पूरी करने वाली देवी के मंदिर में। हमारी हालात होती है पढ़े लिखे मूर्खाे जैसी जबकि हमने बचपन से ये पढ़ा और सुना है कि भगवान कण कण में व्याप्त हैं। हम कर्मकांडो के चक्कर में पड़कर रात दिन दीयों में तेल जलाते रहते हैं अगरबत्तियों को राख करते रहते हैं कभी मोगरे की तो कभी गुलाब की और चंदन की भी। हमारी इस तरह की भक्ति ऐसे ही होती है जैसे हम कितना भी मंहगा मोबाइल खरीद लें, उसमें सिम भी डाल लें लेकिन उस सिम को एक्टिव न करें या कोई मंहगा डेक्सटॉप कम्प्यूटर या लेपटॉप खरीद लें लेकिन उसमें नेट न हो या विंडो  न हो।
ये जो पोस्ट अभी तक आपने पढ़ी ये ऐसे ही है जैसे प्रतिदिन धार्मिक चैनल्स पर कुछ बाबा चिल्ल्लाकर -चिल्ल्लाकर बताते हैं कि आपके जीवन में ये हो रहा है आप इस चीज से पीड़ित है या हमें आत्मा को परमात्मा से मिलाना है ये करना है, वो करना है लेकिन ये बाबा लोग ये नही बताते हैं आखिर करना क्या हैं और कैसे करना है कि हमारा अशांत मन शांत हो जाये। और जो प्रतिदिन धार्मिक चैनल्स पर आदरणीय और सम्मानीय महात्मा ये बताते हैं लोगों का उनकी ओर ध्यान नही जाता क्योंकि वे अपने सत्संग में दिखावा नही करते, नाच गाने को अलॉउ नही करते और सत्संग के बीच में किसी तरह के दान नही मांगते, केवल उस एक परमात्मा की ओर प्रवृत्त होने के मार्ग बताने की भरपूर कोशिश करते हैं।
यदि आप पूरी ईमानदारी से स्वयं को अपनी वर्तमान परिस्थितियों से निकाल कर और बेहतरीन परिस्थियों की इच्छा रखते हैं तो इन बातों को अपनाने की पूरी ईमानदारी से कोशिश करें लेकिन ये ध्यान रखें कि बिना गुरू के ज्ञान नही मिलता लेकिन जब तक गुरू नही मिल जाते इन बातोें को अपनाकर चिंता, तनाव, अजनाने भय और क्रोध को नियंत्रित करें या जब भी ये आपने मस्तिष्क में दर्द करने के लिये आयें आप इनका स्वागत करें लेकिन केवल कुछ क्षणों बाद ही इन्हें विदा करें। इन बातों को अपनाने से पहले एक बात नोट करलें कि ये बातें ऐसे ही असर करेंगी जैसे किसी विशाल वृक्ष के बीज को वृक्ष बनने में समय लगता है। ये बाते हैं-सबसे पहले तो अब इस बात का निश्चय करें कि कौन से देवी देवता या बह्मा, विष्णु, महेश में से, किसमें आपकी गहरी आस्था है। फिर उनसे सम्बंधित मंत्र का पता लगायें की कौन सा मंत्र बह्मा का, कौन सा विष्ण ु का, कौन सा हनुमान जी का, कौन सा दुर्गा माँ का, कौन सा शिवजी का मंत्र हैं उसका अर्थ पता कर लें ध्यान रहे कि 2-10 अक्षरों के बीच वाला ही एक मंत्र चुनना है किसी पाठ को नही। ये बात लगातार अपने दिमाग में रखें कि हमें कोई तंत्र क्रिया या कोई जादू टोना नही करना है बल्कि जो सर्वशक्तिमान परमात्मा है जिसने हमारे लिये खारे समुद्र के पास भी कई मीटर ऊंचे नारीयल के पेड़ में नारियल लटका रखें हैं जिसमें खाने और पीने के लिये मीठा जल भरा है और जो लगातार बिना फ्रिज के ताजा रहता है नीचे कोई टुल्लू पंप भी नही लगा जो पानी को फिल्टर कर ऊपर चढ़ाता हो। भले ही हम कितने ही देवी देवताओं को जानते हों लेकिन परमात्मा केवल एक ही हैं जो हम सभी में विद्यमान हैं जिसकी हमें अपने इस 84 योनियाँ भोगने के बाद मिले मनुष्य जीवन में खोज करनी है उससे कनेक्ट होना है आइये हम परमपिता से जुड़े जिसे योग कहते हैं। योग के बारे में जो शंकाएँ हैं पहले उन्हें किसी किताब के माध्यम से दूर करें योगासन और योग में अंतर समझें। इस पूरी पोस्ट को पढ़ने के बाद किसी जोश में नही दो या तीन दिन बाद सोच विचार कर प्रात: यदि आप 8 बजे उठते हैं तो 6 बजे उठने की कोशिश करें, यदि 6 बजे उठते हैं तो 4:50 या 5 बजे उठने की कोशिश करें।   बाजार से एक प्राणायाम की किताब या बाबा रामदेव वाली कोई प्राणायाम की सीडी खरीद कर उसे देंखें और समझे कि कैसे प्राणायाम करते हैं या सुबह आस्था चैनल लगा कर बाबा रामदेव का कार्यक्रम कम आवाज कर देंखें ताकि परिवार के सदस्यों की नींद न खराब हो । याद रखें कि किसी भी नई आदत को अपनाने में कम से कम 22 दिन लगते हैं। जब आप प्रात: जल्दी उठने की आदत अपना लें और प्राणायाम में अनुलोम विलोम आदि की प्रेक्टिस बिना याद किये करने लगें तो-सुबह जितनी जल्दी हो सके उठकर नित्य कर्मों से निवृत्त होकर एक ऐसी जगह बैठ जाये जहाँ मच्छर और मक्खी आपको परेशान न करें, जहाँ आप बैठें पंखा आपके ठीक सर पर न हो। याद रखें कि इसी जगह पर आपको प्रतिदिन बैठना है। अपना मुख उत्तर या पूर्व दिशा की ओर रखें। एक नया आसन जो पूजा सामग्री की दुकान पर मिलता है ले आयें उसी पर बैठना है ताकि हमारे शरीर का कोई भी अंग डायरेक्ट जमीन से सम्पर्क में न हो या टच न करें। जो प्राणायाम आपने अब तक सीखा है उसे करें। प्राणायाम करने के बाद, ज्ञानमुद्रा में बैठकर, जो आपने अपने आराध्य या ईष्ट का मंत्र चुना था उसे आंखे बंद कर अपने आराध्य या ईष्ट का ध्यान कर बहुत ही धीमी आवाज में जिसे कि केवल आप ही सुन सकें और कोई नही बोलें या जप करें। करीब 20 मिनट या 30 मिनट तक ये क्रिया प्रतिदिन करें । बस इसका अभ्यास जारी रखें और एक सद्गुरू की तलाश पूरी करें ताकि वे आपको आगे का रास्ता बतायें। इस ब्लॉग रूपांतर पर मैने कुछ वेबसाइट के और ब्लॉग के लिंक दिये है जो आपके लिये सहायक होंगे इन्हे किसी समाचार या किसी नोवेल की तरह नही पढ़े एक एक लाईन में गंभीर अर्थ और रहस्य छुपा हुआ है अपनी जीवन को स्वयं ही सुधारें किसी चमत्कार की उम्मीद में न जींये। याद रखें भगवान उसी की सहायता करतें हैं, जो अपनी सहायता स्वयं करता है। हो सके तो जो रविवार को प्रात: 10 बजे दूरदर्शन पर उपनिषद गंगा आता है भी देखें।
एक बात और याद रखें कि जैसे जलते हुए गैस बर्नर पर तवा रखा होता है हम चाहे जितनी भी बंूदें उस पर डालें वह वाष्पित हो जाती हैं और यदि गैस को बंद कर दिया जाये तो ये बंूदें तवे पर इकठ्ठी होने लगती हैं। यही बात हमें तब अपनानी है जब हम प्रात: आसन पर बैठें उस समय हमारे ध्यान में केवल हमारे ईष्ट या आराध्य हों ना कि दुनिया भर की चिंताएं और तनाव नही तो यह ध्यान लगाने से हमारे अंदर जो परमात्मा की शक्ति आनी शुरू होती है वह दूर से ही लौट जाती है क्योंकि हमारा मन कहीं ओर होता है। हमें ध्यान तन्मयता से करना है जिसमें हमारा शरीर न हिले, मन शांत हो। एक उदाहरण और है जैसे हम पेट्रोल पम्प पर गाड़ी को बंद कर देते हैं और अपना मोबाईल भी। उसी तरह जब हम अपने परमात्मा के ध्यान में जायें कुछ देर के लिये दुनियादारी के बातों को भूल जायें।
एक उदाहरण और है इसे समझें जैसे मानलिजिये कोई व्यक्ति कम गुस्सा करता है लेकिन यदि उसे बार बार कोई परेशान करता है तो उस व्यक्ति के ऊपर क्रोध हावी हो जाता है और उसके मुख से ऐसी ऐसी गालियाँ निकलतीं हैं जिसे वह स्वयं ही नहीं बोलना चाहता, पता नही कहाँ कहाँ के गड़े मुर्दे और पुरानी बातें वह कहने लगता उनके उदाहरण देने लगता है जिसकी कि उस व्यक्ति ने उम्मीद भी नही की होगी जिसने उस व्यक्ति को क्रोध दिलाया यही वह समय होता है जब व्यक्ति के अवचेतन में में सोया हुआ जानवर जाग उठता है या कहें कि ऐनीमल ब्रेन एक्टिव हो जाता है। उसके हाथ पैर कांपने लगते हैं, सांसों की रफ्तार तेज हो जाती है कभी कभी तो हृदय गति भी रूक जाती है और वह मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। हमारे दो मन होते हैं जिनमें से एक है अवचेतन मन इस मन में हमारे संस्कार और जो हमारे पूर्व जन्मों के संस्कार हैं सोये पड़े रहते हैं। इसी मन में जानवर और देवता के गुण भी होते हैं जानवर कैसे इस मन से बाहर आता है यह तो मैने इस उदाहरण से बता ही दिया है अब बारी है कि देवता कैसे जागृत होते हैं यानी हमारी आंतरिक शक्तियाँ। आपने देखा होगा कि जब किसी सरोवर या किसी बड़े पानी के बर्तन में लहरें या हलचल बनी रहती है तब तक हम उसमें अपना प्रतिबिम्ब नही देख सकते लेकिन जैसे ही सरोवर शांत होता है उसमें हमारा प्रतिबिम्ब तो नजर आता ही साथ साथ हमारे आसपास के दृश्य भी नजर आते हैं उसी प्रकार जब हम ध्यान में होते हैं तब हमारी आंतरिक शक्तियाँ अवचेतन में जागृत होने लगती हैं। हमें अपनी शक्तियों के दर्शन होने लगते हैं। आप नेट पर या किसी किताब या अपने गुरू से हमारे जो लेफ्ट ब्रेन और राइट ब्रेन होते हैं उसके बारे में भी जानें तों आप अपनी दिनचर्या में सुधार कर सकते हैं। ध्यान और जप भी कई प्रकार के होते हैं लेकिन सबका एक ही लक्ष्य होता है परमपिता परमेश्वर से जुड़ना उनका ध्यान करना। यकीन मानिये भगवान हमारी कल्पनाओं से भी अधिक है वही 1 है जिसने हमारी पृथ्वी जैसी पता नही कितनी पृथ्वीयां बनाई हुई हैं कितने ही सूर्य अंतरिक्ष में अपना प्रकाश फैला रहे हैं। वही है जो दुनियाँ में लोग किसी भी भाषा में उसे पुकारें सुनता है। हमारे देश में कितनी ही भाषाएँ बोली जाती हैं भिन्न भिन्न जाति और संप्रदाय के लोग उसे अपने अपने तरीके से पूजते हैं लेकिन वो एक ही है। हरि अनंत, हरि कथा अनंता। उस परमात्मा की एक रत्ती भर भी शक्ति किसी में आ जाती है तो वह ऐसे ऐसे कार्य कर जाता है जिसकी कि हम कल्पना भी नही कर सकते जो हमे असंभव प्रतीत होते हैं। और ये सभी शक्तियाँ हमारे अंदर हैं सबसे ज्यादा गति प्रकाश की होती है सूर्य का प्रकाश आठ मिनट और अठारह सेकंड में पृथ्वी पर आता है लेकिन आपके अमेरिका कहने मात्र से ही अपना मन अमेरिका में पहँुच जाता है, चाँद कहने से चाँद पर और न जाने केवल सोचने मात्र से हमारा मन वहाँ पहुंच जाता है। लेकिन ध्यान में हमें अपने मन को विषयों और विचारों से खाली रखना है तभी वह शक्ति हमारे अंदर प्रवेश करेगी। एक बात चाहे तो आप अपना सकते हैं कि माला और माल हमेशा छिपाकर रखना चाहिये। आप ध्यान करें लेकिन आप उसका प्रचार न करें क्योकि आपके आस पास के लोग आपका मजाक बना सकते हैं और जैसे आप किसी टीचर से कोचिंग लेते हैं या ट्यूशन पढ़ने जाते है तो आप यदि अपने साथियों से उनके बारे में बताते है तब भी कोई उनकी बुराई करता है कोई कहता है मेरा टीचर इससे भी अच्छा पढ़ाते हैं। इससे होता ये है कि हमारा ध्यान भटकता है और मन भी। इसलिये अपना गुरू के नाम का सिक्रेट बनाये रखें, केवल जहाँ बताने की आवश्यकता हो वहीं बतायें। जिस दिन से आप ध्यान की प्रेक्टिस करना प्रारंभ करें उस दिन में दिखावे और अहंकार को धीरे धीरे कम करने का प्रयास जारी रखें। अपना हर परिस्थिति में संतुलन रखें जैसे आपका कोई निकट सहयोगी या रिश्तेदार ज्यादा कमा रहा है या तरक्की कर रहा है उससे मैत्री भाव रखें देखें की उसमें कौन से अच्छे गुण हैं। और यदि कोई आपकी अधिक बढ़ाई या प्रशंसा करे तो चने के झाड़ पर न चढ़े, अहंकार से बचें और यदि कोई आपका अपमान करें तो उस अपमान को पचा लें कोई रियेक्शन न दें। और यदि आपकी आमदनी कम है तो उसमें संतुष्ट रहकर धीरे धीरे प्रगति करें ना कि स्वयं को शोक और हीनभावना से ग्रस्त करें। ये सभी तप की श्रेणी में आते हैं। यदि आप किसी रास्ते से जा रहें है वहां कोई बड़ा अवरोधक पत्थर पड़ा है उसे हटा दें स्वयं के अंदर सेवा का भाव लाये। हमेशा दुखी रहने की आदत में हमारे मुख की आकृति ऐसी हो जाती है कि यदि हम कभी खुश भी होते हें तो हमारे मुख की आकृति नही बदलती इसलिय हमेशा दुखी और अपना रोना किसी दूसरे के आगे न रोयें। अब ये पोस्ट विषय से भटक रही है इसलिये इतना ही।
एक बात गांठ बांध लें कि जब एक बीज वृक्ष बनने की ओर अग्रसर होता है तो ढेरों मुसीबतें आती हैं तूफान, घनघोर वर्षा, तपा देने वाली भीषण गर्मी आदि। याद रखें की आप कैसी भी परिस्थिति हो किसी निराशा में आकर ध्यान से न चुकें भले ही कम समय के लिये उस दुखद या मुसीबत के समय ध्यान करें लेकिन करें जरूर। याद रखें कि मुश्किलें भी मुश्किल में पड़ जातीं हैं जब वे परमात्मा का नाम सुनती हैं। भले ही एक दीपक तूफान में, निराशा के कारण बुझ जायें लेकिन परमात्मा किसी न किसी दूसरे दीये को भेज देता है भले ही देर से भेजे और वह दूसरा दीये पहले दीये को अपनी लौ से फिर से रोशन कर देता है। भगवान ने गीता में कहा है जो सतत् मेरा ध्यान करता है मै उसके योग की रक्षा करता हँू। जैसे प्रह्लाद की भक्ति ने भगवान को एक खम्बे से प्रकट कर दिया और भगवान ने नरसिंह अवतार में आकर उसकी रक्षा की। जब तेरे काज तुझसे न संवरें वंदे, अपने मालिक पर छोड़ तो अपने धंधे।

ज्यो तिल माहि तेल है, ज्यो चकमक में आग.
तेरा साईं तुझमे है, जाग सके तो जाग.


4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सारगर्भित आलेख...जब तक जीवन में संतुष्टी को नहीं अपनाएंगे, तब तक जीवन में कभी शान्ति नहीं मिल सकती...

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  2. bahut hi achchha lekh hai. yah lekh bahut se logo ko prerna de sakata hai, niras aur bhay se grast logo ke liye bahut prrna dayak hai aur bagat singh panthi ji bahut hi sanjeeda insan hai apka dhanyavad

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  3. bhagat singh ji - bhagavan narayan hari ap par kripa dristi banaye rakhe

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